बार-बार बदलते रोस्टर ने चढ़ाया सियासी पारा, चौथी बार हुआ बदलाव, चुनावी दंगल में कूदने वालों की धडक़न बेकाबू
हिमाचल प्रदेश में पंचायत चुनावों की घोषणा से पहले ही सियासी पारा अपने उफान पर है। मुद्दा है आरक्षण और रोस्टर का। प्रदेश में आरक्षण नियमों को लेकर मचे घमासान के बीच अब चौथी बार नया रोस्टर जारी किया गया है। सरकार के बार-बार बदलते फैसलों ने जहां भावी उम्मीदवारों की नींद उड़ा दी है, वहीं विपक्ष भी पंचायत चुनावों के सस्पेंस को लेकर हमलावर है। पंचायत इसकी शुरुआत तब हुई, जब सरकार ने घोषणा की कि इस बार आरक्षण पूरी तरह नए सिरे से तय होगा। इस खबर के आते ही भावी उम्मीदवारों ने अपनी गोटियां सेट करनी शुरू कर दीं, लेकिन यह उत्साह ज्यादा दिन नहीं टिका। सरकार जल्द ही अपने कदम पीछे खींचती नजर आई और नया फरमान जारी हुआ कि जो पंचायतें लगातार दो बार आरक्षित रही हैं, उन्हें इस बार सामान्य कर दिया जाएगा। विवाद तब और गरमाया जब तीसरे चरण में सरकार ने जिलाधिकारियों को पांच प्रतिशत तक आरक्षण तय करने की विशेष शक्तियां दे दीं।
इस फैसले को आनन-फानन में हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। अदालत ने सरकार के इस कदम पर ब्रेक लगा दिया, जिससे चुनावी तैयारियों पर असमंजस के बादल छा गए। अदालती दखल के बाद अब चौथी बार जारी रोस्टर में सरकार ने बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है। नए नियमों में फिर से दो बार आरक्षित रही पंचायतों को इस बार आरक्षित न करने की बात दोहराई गई है, जबकि पंचायती राज अधिनियम के तहत महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण को सख्ती से लागू किया जाना है। इसके अलावा एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग के लिए संवैधानिक कोटा सुनिश्चित करना भी अनिवार्य है। ऐसे में बार-बार बदलते नियमों ने प्रदेश की राजनीति को दो धड़ों में बांट दिया है। विपक्ष इसे सरकार की प्रशासनिक विफलता बता रहा है। वहीं, प्रदेश सरकार का तर्क है कि आरक्षण की प्रक्रिया जटिल है और वे सामाजिक संतुलन बनाए रखने के लिए नियमों को पारदर्शी बना रहे हैं।
समीकरणों से परेशान
नियमों के इस यू-टर्न से सबसे ज्यादा परेशान वो उम्मीदवार हैं, जो पिछले कई महीनों से जमीन पर पसीना बहा रहे हैं। रोस्टर बदलते ही कई दिग्गजों की सीटें सुरक्षित से सामान्य या सामान्य से आरक्षित हो गई हैं।
Reviewed by SBR
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April 09, 2026
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